dub ke bahugunee laabh | दुब के बहुगुणी लाभ : doob ke naam  

dub ke bahugunee laabh : दुब के बहुगुणी लाभ, Medicinal value of Conch Grass, dub kee prajaatiyaan dub ko prajaatiyaan.

दोस्तों नमस्ते आज मैं इस लेख के माध्यम से ‘ दुब ‘ याने की ‘ दूर्वा ‘ घास की जानकारी मिलनेवाली है। ‘ दुब ‘ यह एक आश्चर्यकारक महत्वपूर्ण वनस्पति है, यह वनस्पति बहुत ही गुणकारी, उपयुक्त सभी प्राणी के लिए आरोग्यवर्धक, रामबाण उपाय है dub ke bahugunee laabh.

dub ke bahugunee laabh | दुब के बहुगुणी लाभ : doob ke naam  

दुब के नाम | doob ke naam

मराठी – दूर्वा

हिंदी – दुब

संस्कृत – अमृत, अनंता, गौरी

इंग्लिश – Conch Grass (कोंच ग्रास)

dub धार्मिक दृष्टी से बहुत ही महत्वपूर्ण है, ठीक उसी तरह दवा के लिए भी महत्वपूर्ण है। इस वनस्पति को बहुत ही प्रिय माना जाता है। कोई भी मंगल कार्यालय में सुपारी का महत्व होता है वैसे ही दुब का महत्व होता है। दुब जिस तरह से फैलती है ठीक उसी तरह से हमारे वंसज का विस्तार होना चाहिए ऎसी धार्मिक भावना है। वनस्पतिशास्त्र के नुसार दुब, घास की प्रजाति में आता है। दुब का महत्व ऋग्वेद काल से है।

dub kee dant katha :

दुब के जन्म की दन्त कथा प्रसिद्ध है। दुब ब्रम्हदेव के शरीर से प्रगट हुई एक देवता है। दुब ने तपश्चर्या की और भगवान गणपति बाप्पा को प्रसन्न किया और भगवान गणपति ने उसे वरदान दिया लेकिन दुब को वरदान का गर्व हुआ। माता पार्वती ने उसे शाप दिया की तू दुब के रूप में धरती पर अवतरित होगी। लेकिन दुब ने तपश्चर्या करके शाप से मुक्ति पाई और भगवान गणपति बाप्पा के पूजा में स्थान मिलाया।

” दुब ” गणपतिबाप्पा को बहुत ही प्रिय है। 21 दिन तक गणपति को दुब चढ़ाने से धन में वृद्धि होती है ऎसी धारणा है। लेकिन गणपति को दुब प्रिय क्यों ? इसके पिछे भी एक दन्त कथा है। …

अनलासुल नाम का एक महाभयंकर क्रूर राक्षस था। उसके चिल्लाने से धरती के मानव भी कापने लगते थे। उसके आँखों से अग्नि की ज्वाला बाहर निकलती थी। इस राक्षस के कारण धरित के मानव बहुत ही त्रस्त हुए। भगवान भी त्रस्त हुए। सभी ने भगवान गणपति की आराधना चालू किये विघ्नहर्ता गणपति प्रसन्न हुए। उन्हों ने राक्षस से लढाई किये लढाई में राक्षस गणपति को खाने के लिए पास में आये लेकिन मौका देख के राक्षस को गणपति ने खा लिया इस कारण सभी देव और प्रजाजन आनंदित हुए। लेकिन उसे खाने से गणपति के पेट में अंगार होने लगी।

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गणपति के शरीर के अंदर की अंगार शांत होने के लिए गणपति के मस्तक पर चंद्र की स्थापना किये, भगवान विष्णु ने अपने हाथ का कमल गणपति को दिया, भगवान शंकर ने अपने गले का नाग उसके कमर में बाँधा, वरुण देव ने जलवर्षा किये इसी तरह से शांत करने का प्रयास कर रहे थे लेकिन अंगार शांत नहीं हुई।

वहाँ पर तपस्वी ऋषि-मुनि आये सभी ने उसके मस्तक पर 21 दुब की जुडिया बनाये गणपति के मस्तक पर रखे और अंगार शांत हुई। तभी गणपति प्रसन्न हुए और कहने लगे, ” मेरे पेट की अंगार शांत करने के लिए बहुत उपाय किये लेकिन दुब के कारण अंगार शांत हुई जो भी मनुष्य मुझे दुब अर्पण करेगा उसे यज्ञयाग, व्रत, दान और तीर्थयात्रा आदि की पुण्यप्राप्ति होगी। ”

मराठी में दुब की कुछ पंगतियाँ है …..

एकविसावी माझी ओवी

एकवीस दूर्वा आना

वाहा देवा

गजानना लंबोदरा

संकष्ट चतुर्थी चंद्र दिसतो हिरवा

सखी वेचते दूर्वा पूजेसाठी

” दुब ” वनस्पति अतिप्राचीन काल से है, इसे घोडा, बकरी, गैया, हिरण, चुवहाँ और खरगोस आदि प्राणियों का पसंदिता खाद्य है। दुब के खाने से घोड़े को जल्द दौड़ने की शक्ति, स्फूर्ति और हड्डिया मजबूत होती है।

सूअर, घुस और बतख आदि जमीन से दुब की जड़ो को खाते है। वाघ घास कभी नहीं खाता लेकिन पेट में दर्द होता है तभी वाघ दुब खाता है वैसे ही नेवला और साप दोनों की लढाई होने के बाद नेवला दुब खाता है।

दुब की प्रजातियाँ | dub kee prajaatiyaan dub ko prajaatiyaan   

दुब के हरली, भाजा, शतमूल, मंगला, शतग्रंथि आदि नाम है। हरली दुब की तीन प्रजातियां है, श्वेत दुब (सफेद), गंडदुब(हरी), निलदुब (नीली) आदि का रस कम-ज्यादा निकलता है। रस की टेस्ट मीठी, कड़वाहट और तुरट है। सफ़ेद दुब दवा के लिए उपयोगी आती है। नीली दुब बहुत ही जल्द फैलती है इसलिए उसे ‘ अनंता ‘ कहते है।

Medicinal value of Conch Grass  | दुब के औषधीय महत्व 
  • नाक से गर्मी के कारण खून निकलता हो तो नाक में दुब का रस डालना चाहिए।
  • हिचकी लगी हो तो दुब के जड़ों का रस पीना चाहिए।
  • बच्चों को जन्त होने पर दुबयुक्त पानी देते है।
  • बुखार आने पर बुखार की गर्मी कम करने के लिए चावल और दुब एकसाथ पीस के उसका लेप मस्तक पर लगाने से बुखार की गर्मी कम होती है।
  • रक्तिमूलव्याध अतिसार, आमांश पर दुब और उसके जड़ों का रस देने से आराम होता है।
  • शरीर में पित का प्रमाण बढ़ने से दुब के जड़ों की चटनी पीस के खड़ीशक़्कर और गाय के दूध के साथ सुबह लेना चाहिए।
  • पैरो के उँगलियों में चिखली होने पर दुब का रस लगाना चाहिए आराम मिलता है।
  • मधुमेह  के रोगी ने और चर्मरोगी ने दुब पर चलना चाहिए आराम मिलता है।
  • दुब का रस सेवन करने से पेट के विकार दूर होते है।
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  • दुबयुक्त पानी पिने से मष्तिष्क शांत रहता है।
  • सुबह के समय 10-15 मिनट दुब पर चलने से गर्मी निकलती है।
  • उलटी से खून निकलता होगा तो, दुब का रस सेवन करना चाहिए आराम मिलता है।
  • आदिवासी लोग जख्म के घाव पर दुब को बारीक़ पीस कर लेप लगाते थे।
  • अम्लपित्त, जागरण के कारण आँखों में जलन होती है तभी दुब के 20 कवले तिनके धोकर के खाना चाहिए।
  •  कम्प्यूटर पर काम करने से आँखों पर आनेवाला तान दुब के रस से कम होता है।
  • दुब के रस से मुँह की दुर्गंधि नहीं आती और दांत मजबूत होते है।

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