True Patriot Rajguru (1908-1931) : सच्चा देशभक्त राजगुरु

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True Patriot Rajguru ( 1908-1931)

कर चले हम फ़िदा जान-ओ -तन साथियों… अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों… मेरा रंग दे बसंती चोला  माये रंग दे…बसंती चला… किस्मत वालों को मिलता…ऐसे मरने का मौका  निकली है बरात…सजा है, इंक़लाब का डोला… मेरा रंग दे बसंती चोला… शहिदों के चिताओं पर हर बरस लगेंगे मेले, वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा …

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राजगुरु का परिचय/Introduction to Rajguru

नाम :- शिवराम हरी राजगुरु  True Patriot Rajguru (1908-1931)

जन्म दिनांक :- 24 अगस्त 1908

जन्म स्थान :- खेड़ा, पुणे (महाराष्ट्र)

पिताजी का नाम :- हरिनारायण

माताजी का नाम :- पार्वतीबाई

शहीद :- 23 मार्च 1931

राजगुरु का पारिवारिक जीवन/ Rajguru’s family life

शिवराम हरी राजगुरु इनका जन्म महाराष्ट्र के पुणे जिल्हे के “खेडा ” गाव में 24अगस्त 1908 को हुआ था। राजगुरु को “रघुनाथ” के नाम से ही पुकार ते थे। राजगुरु की माताजी प्यार से ” शिव ” और ” बापू साहेब ” के नाम से पुकारते थे। राजगुरु का प्राथमिक शिक्षण खेड़े गाव में ही पूरा  हुआ।आगे की शिक्षा के लिए उन्हें अमरावती जाना पढ़ा।वहा हनुमान व्यायाम शाला में जाते जाते वहा चल रहे विचारवंत लोगो के संपर्क में आकर राजगुरु पर देशभक्ति विचारो का प्रभाव पढ़ा।

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जालियनवाला बाग नरसहार/Jalianwala Bagh massacre

राजगुरु के पिताजी हरिनारायणजी का निधन हुआ, तभी उनकी उम्र 06 साल की थी। उस समय भारत में अंग्रेज का शासन था। अंग्रेजों को भारत से भगाने के लिए आंदोलन करना चालू हुआ था। आंदोलन में बहुत क्रांतिकारी शहीद हुए थे। अंग्रेजों ने अपना शासन मजबूत बनाने के लिए सन 1919 में रौलट एक्ट का कायदा लागु किया गया।

रौलट एक्ट लागु करने के लिए जालियनवाला बाग में एक सभा का आयोजन किया गया था।जालियानवाला बाग चारों और से बंधिस्थ था। प्रवेश और बाहर जाने के लिए मात्र एक ही रास्ता था। सभी लोग सभा के लिए जालिनवाला बाग में उपस्थित हुए और ब्रिटिश पुलिस जनरल डायर ने सभी लोगोंपर गोलिया चलाने का आदेश दिया और सभी लोग मारे गए, बाग में कुँवा थी उस कुवे में जान बचाने के लिए लोग कुधे थे, कुँवा लासो से भर गया था। इस तरह से निर्दोस, बेगुना, छोटे बच्चे , महिलाएं सभी की लासे गोलियों से छल्ली हुई थी।

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जालियनवाला हत्याकांड के समय राजगुरु की उम्र 12 साल की थी। राजगुरु की पढ़ाई चालू थी। स्कुल में टीचर हत्याकांड की चर्चा कर रहे थे, राजगुरु चर्चा सुनते थे लेकिन उन्हें हत्याकांड की पूरी बाते सुनने को नहीं मिली। स्कुल की छुट्टी होने पर राजगुरु घर जाने लगे लेकिन उनके मन में एक ही बात जगह बना रही थी की, हत्याकांड क्यों हुआ ? बेगुनाह क्यों मारे गए, अंग्रेज कौन है ? भारत को माता क्यों कहते है ? देशभक्त कैसे होते है ? आदि के बारे में कुछ भी पता नहीं था। सभी की जानकारी के लिए राजगुरु एक वृद्ध के पास गए जो की गांव में किसानी करता था। उस वृद्ध ने 1857 के क्रांति के बाद सेना छोड़ दी थी।

भारत देश ही हमारी माता, जननी है, इसकी रक्षा के लिए प्राणों की जान देनी पड़ती है। जो सच्चा देशभक्त है, वो भारत माँ के रक्षा के लिए, गुलामी से आझादी पाने के लिए संघर्ष करता है वही सच्चा देशभक्त कहलाता है।

 हिन्दुस्थान सोसलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी सैनिक / Hindustan Socialist Republican Army soldiers

1923 में संस्कृत की शिक्षा पाने के लिए राजगुरु बनारस गए और वहा रहकर न्यायशास्त्र की शिक्षा भी पास कर ली। इस बिच चंद्रशेखर आजाद के साथ उनका परिचय हो गया और बंगाली क्रान्तिकारी गट का काफी प्रभाव दिखाई दे रहा था। राजगुरु इस गट में भी शामिल हो गए।

राजगुरु पर छत्रपति शिवाजी महाराज की गनिमी निति की युद्ध पद्धति का प्रभाव था। “कांग्रेस सेवा दल” के माध्यम से सामाजिक, व राजनितिक क्षेत्र में सहभाग ले के “हिन्दुस्थान रिपब्लिकन आर्मी” में प्रवेश ली. इस संघटना के माध्यम से उत्तर भारत के क्रांतिकारी कार्यो में सहभाग लिए। क्रान्तिकर्यो द्वारा स्थापना किये गए “ हिंदुस्तान सोसलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी ” के सैनिक बने।

सायमन कमीशन / Simon Commission

पंजाबी क्रन्तिकारी गट इनके सम्पर्क में आने से उनके शहीद भगतसिंग, सुखदेव, जतिनदास, जैसे मित्र मिले. इसी समय “सायमन कमिसन” विरोधी आन्दोलन में लाला राजपत राय पोलिस लाठीचार्ज में उनका निधन हो गया. क्रांतिकारियों ने इस निधन का बदला लेने के उद्देश्य से कुछ गट बनाये जिनमे क्रान्तिकारी चंद्रशेखर आजाद ,शिवराम राजगुरु, भगतसिंग, जयगोपाल, जैसे क्रन्तिकारी मुख्य थे और इस क्रन्तिकारी गट ने 17 दिसम्बर 1928 में, लाहोर में, पोलिस अधिकारी सानडसर्वर पर गोली बार की थी।

गोलीबार हत्याकांड में गोलीबार की सुरुवात राजगुरु ने की थी और इस घटना के बाद अंग्रेजी हुकूमत से नजरे चुराकर 22 महीनो तक अज्ञातवास में रहना पढ़ा।अंत में 30 सेप्टेम्बर 1929, में पुणे में उनको हिरासत में ले लिया गया। इस तरह बहादुर क्रांतिकारियों को भगतसिंह , राजगुरु और सुखदेव इनके समवेत 24 मार्च 1931 को फाशी की सजा सुनाये थे लेकिन अंग्रेज सरकार को डर था की 24 मार्च को क्रांतिकारी और देश की जनता आकर फांसी होने से रोक सकते थे इसलिय अंग्रेज सरकार  ने 23 मार्च 1931 को लाहोर के जेल में फासी दे दी और भारत माँ के सपूत मर कर भी अमर हो गए।

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