Biography of Dr. Maharshi Karve:डॉ.महर्षि कर्वे की जीवनी

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Biography of Dr. Maharshi Karve : डॉ.महर्षि कर्वे की जीवनी

डॉ. धोंडो केशव कर्वे (dr dhondo keshav karve) को ‘महर्षि कर्वे’ के नाम के साथ बड़े ही सम्मान और आदर के साथ याद किए जाने वाले आधुनिक भारत के सबसे बड़े समाज सुधारक और उद्धारक माने जाते हैं जिन्होंने महिला शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. अपना पूरा जीवन विभिन्न आंदोलन और संघर्षों में भी समाज सेवा करते हुए समाप्त कर देने वाले महर्षि कर्वे ने अपने कथन को बिल्कुल सच साबित कर दिया. 1958 में 100 वर्ष की आयु में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया.

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महर्षि धोंडो केशव कर्वे का पारिवारिक जीवन:Family life of Maharshi Dhondo
Keshav Karve

महर्षि धोंडो केशव कर्वे का जन्म 18 अप्रैल 1858 को रत्नागिरी जिले के (maharshi dhondo keshav karve birthplace) शेरवाली गाँव में हुआ था. उनकी प्राथमिक शिक्षा मुरुड गांव में पूरी हुई. उनकी आगे की पढ़ाई मुंबई में पूरी हुई. 1881 में मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद, उन्होंने एलफिंस्टन कॉलेज, मुंबई में प्रवेश लिया. इस कॉलेज से गणित की उपाधि प्राप्त की. उनकी शादी 14 साल की उम्र में राधाबाई से हुई थी. उस समय राधाबाई 08 वर्ष की थीं. फर्ग्यूसन कॉलेज में गणित पढ़ाना शुरू किया. 1914 तक काम किया. लोकमान्य तिलक फर्ग्यूसन कॉलेज में गणित पढ़ा रहे थे. महर्षि धोंडो केशव कर्वे ने इस काल में 1891 से 1914 तक गणित पढ़ाया.

विधवा विवाह जानकारी: Widow Marriage Information

महर्षि कर्वे विधवा विवाह के आंदोलन के मुख्य कार्यकारी थे. लॉर्ड विलियम बेंटिंग ने सतीप्रथा की चाल को रोक दिया। सतीप्रथा के रुकने से विधवाओं की संख्या बढ़ने लगी.इन विधवाओं को समाज में नगण्य माना जाता था. इसलिए, महर्षि धोंडे केशव कर्वे ने इस कारण से काम करना शुरू किया कि विधवा महिलाओं को पुनर्विवाह का अधिकार मिलना चाहिए.

उन्होंने इस कार्य की सुरुवात अपने से की, उनकी पत्नी राधाबाई का मृत्यु उम्र के 27 साल में सन 1891 में डिलेवरी के समय हुआ. उस समय धोंडो केशव की उम्र 45 साल की थी. प्रौढ़ अवस्था में विधुर हुए पुरुष को दूसरे लड़की से शादी करने की परम्परा थी. छोटे पण में लड़की की शादी होती थी लेकिन पति अगर मर गया तो उस लड़की को अपना पूरा जीवन विधवा बन के रहना पड़ता था. समाज के इस प्रथा को बंद करने के लिए धोंडो केशव कर्वे ने पंडिता रमाबाई के शारदा सदन संस्था में पढ़नेवाली गोदूबाई इस विधवा से पुनर्विवाह किया. यह बात समाज को मान्य नहीं थी. वे अपने पत्नी के साथ मुरुड को चले गए. आगे चल के गोदूबाई आनंदी कर्वे या बाया कर्वे करके प्रसिद्ध हुई.

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धोंडो केशव कर्वे का पुनर्विवाह के बाद पुनरुद्धार होना चाहिए, इसलिए इस दिन 21 मई 1894 को, धोंडो ने पुनर्विवाह का एक कार्यक्रम रखा और “विधवा-विवाह प्रतिबंध रोकथाम” मंडल की स्थापना की. विधवा-विवाह को विरोध करनेवाले लोगों के लिए इस मंडल की स्थापना की गई.1896 में, धोंडो केशव कर्वे ने महिलाओं की इस दलदल से छुटकारा पाने के लिए छह विधवाओं के साथ “अनाथ लड़की बाल श्रम” निकाला, जो बाल विवाह, केशवपन जैसे अन्यायपूर्ण रूढ़ियों में रहते हैं. ” विधवा मैरिटल ’’ मंडल की स्थापना. रावबहादुर गणेश गोविन्द गोखले  ने धोंडो केशव कर्वे के कार्य देख कर हिंगना की अपनी 06 एकर जमीन और संस्था निर्माण के लिए 750 रूपये धोंडो केशव कर्वे को दिए, इस के माध्यम से धोंडो केशव कर्वे ने एक कुटिया बनाई. यह कुटिया स्त्री शिक्षण संस्था की गंगोत्री है.

1900 में, अनाथ बालिकाश्रम को हिगना में स्थानांतरित कर दिया गया. यहाँ पर धोंडो केशव कर्वे ने विधवा महिलाओं के लिए वसतिगृह का निर्माण किया. धोंडो केशव कर्वे उनकी कृतियों पंडिता रमाबाई और ईश्वरचंद्र विद्यासागर से बहुत प्रभावित थे और उन्होंने हरबर्ट स्पेंसर के विचारों का अनुसरण किया.

महर्षि धोंडो केशव कर्वे – शैक्षणिक कार्य / Maharishi Dhondo Keshav Karve – maharshi karve work

उनके जीवन का उद्देश्य महिलाओं को शिक्षित करना था. अगर समाज में सुधार की जरूरत है, तो महिला को साक्षर बनाना जरूरी है. स्त्री को शिक्षित करने का अर्थ है अपने पूरे परिवार को साक्षर बनाना. इस उद्देश्य से प्रेरित होकर, महिलाओं को शिक्षित करना और सामाजिक अधिकार देना इसके लिए काम करने लगा. 1896 में, महर्षि धोंडो केशव कर्वे ने पुणे के पास हिंगना (अबी-कर्वे नगर) में इस गाँव में विधवा महिलाओं के लिए एक आश्रम स्थापित किया। इस आश्रम में, महिला विद्यालय की स्थापना 1907 में हुई थी. महर्षि केशव कर्वे की 20 वर्षीय महुनी-पार्वतीबाई अठावले इस स्कूल की पहली छात्रा थीं.

आश्रम और स्कुल चलाने के लिए मनुष्यबल की निर्मिति करने के लिए सन 1910 को ” निष्काम कर्मठा ” की स्थापना की. आगे कार्य बढ़ते ही गए सभी संस्था का एकत्रीकरण करके ” हिंगने स्त्री शिक्षण संस्था ” और ” महर्षि कर्वे स्त्री शिक्षण संस्था (maharshi karve women’s education institute) ” इस तर से उसका नामकरण किया गया. सन 1996 को उनके कार्यो को 100 साल पुरे हुए. इस कारण महर्षि कर्वे स्त्री शिक्षण संस्था की तरफ से शैक्षणिक और सामाजिक कार्य करनेवाले महिला को ” बाया कर्वे पुरस्कार ” दिया जाता है.

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जापान के महिला विद्यापीठ को विजिट देने के बाद महर्षि धोंडो केशव कर्वे ने सन 1916 में भारत के प्रथम ” महिला विद्यापीठ की स्थापना पुणे में की. महिला को मातृभाषा और गृहोपयोगी शिक्षण मिलना चाहिए यह उनका उद्देश्य था.

सन 1920 में सर विट्ठलदासजी ठाकरसी ने कर्वे के महिला विद्यापीठ को 15 लाख की दान किए और महिला विद्यापीठ का नाम श्रीमती नाथीबाई दामोधरजी ठाकरसी दिया गया. इस विद्यापीठ का मुख्य कार्यालय पूना से मुंबई लेकर गए. बहुत प्रज्ञावंत महिला ने विद्यापीठ में कुलगुरु पद पर विराजमान हुए.

इंग्लैंड, जर्मनी, जापान, अमेरिका, इस देश का दौरा करते हुए, धोंडो केशव कर्वे ने अपने संस्थान और संकल्प के बारे में पूरी दुनिया में जानकारी दी. बर्लिन में रहते हुए, वह अलबर्ट आइंस्टीन से मिला, जो सापेक्षतावाद के अग्रदूत थे. बर्लिन में होम साइंस स्कूल को देखें, टोक्यो में महिला स्कूल देखें, सभी राष्ट्रों का अभ्यास करके अपने विद्यापीठ में उस विचारों को चालना दिए.

1936 में, महाराष्ट्र ग्राम प्राथमिक शिक्षा महामंडल की स्थापना हुई। इस संस्था के माध्यम से, पुना शहर में लड़कों के लिए (maharshi karve college pune) एक स्कूल खोला गया था.

महर्षि धोंडो केशव कर्वे की खास बातें / Important things of Maharishi Dhondo Keshav Karve
  • 1952 में, बनारस विद्यापीठ ने डी. लिट् की उपाधि से सम्मानित किया.
  • 1951 में, पुणे विद्यापीठ और 1954 में महिला विद्यापीठ, ने डी. लिट उपाधि
    से सम्मानित.
  • महर्षि कर्वे (maharshi karve bharat ratna) जन्म शताब्दी के दिन 1958 में “भारतरत्न” से
    सम्मानित किया.
  • उनकी आयु के 104 वें वर्ष में 9 नवंबर, 1962 को मृत्यु हो गई.
  • धोंडो केशव कर्वे ने ” निष्काम कर्मठ ” यह संस्था स्थापन किया क्यों की
    , उन्हें आश्रम और स्कुल इसके लिए कौशलपूर्ण मनुष्यबल निर्माण करना था.
  • महर्षि धोंडो केशव कर्वे ने विधवा महिला के लिए “अनाथ बालिकाश्रम” की
    स्थापना की.
  • महर्षि धोंडो केशव कर्वे ने समता संघ की स्थापना की.
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