कावेरी नदी की कहानी | Story of river kaveri

कावेरी नदी दक्षिण भारत की नदी है।जिस तरह गंगा का पानी पवित्र माना जाता है उसी प्रकार कावेरि नदी का पानी पवित्र माना जाता है।

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कावेरी नदी का उद्गम | Origin of Kaveri river

कावेरी नदीका उद्गम कर्नाटक राज्य के ” ब्रम्हगिरी ” पर्वत पर 1320 मीटर उचाई पर हुआ है। उद्गम के जगह पर कावेरी नदी छोटे से झरने जैसी दिखती है। इस झरने का पानी सबसे पहले छोटा तालाब में जाता है उसके बाद में बड़े तालाब में आता है और कावेरी नदी देखते ही देखते बहुत बड़ा विशाल रूप धारण करती है।

कावेरी नदी की लम्बाई 765 मीटर है। बहते समय कावेरी अपने अनेक रूप धारण करते हुए जाती है। कभी-कभी छोटे से झरने जैसी बहते रहती है। 

तमिलनाडु में प्रवेश करने से पहले उसका प्रवाह बहुत ही छोटा है , उसे ” आडूथंडम कावेरी ” याने की बहुत ही छोटी याने की नाले जैसी जिसे हम आसानी से पार करके जा सकते है। कर्नाटक राज्य में वृन्दावन में धबधबे जैसा आवाज करते हुए बहते रहती है। शिवसमुंद्रम में निचे के पत्थर से कावेरी इन्द्रधनुष्य जैसी सप्तरंगी दिखती है। 

कावेरि के उद्गम का प्रदेश ”कुर्ग ” के नाम से पहचाना जाता है। इस प्रदेश के लोग बहुत साहसी निडर और पराक्रमी है, टीपू सुल्तान ने इस प्रदेश पर राज्य किया। पर्वत पर टिपूसुल्तान की शिला है।

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कावेरी नदी की रहस्यमय कहानी (पौराणिक कथा) | The mysterious story of the Kaveri river     

कावेरी बचपन से ही गुणसम्पन्न थी। कावेरी बड़ी हुई , और दिखने में कावेरी बहुत ही सुंदर थी। एक बार कावेरी अपने घर में थी और अगस्त्य ऋषि उनके घर आया था। कावेरी को देखते बराबर अगस्त्य ऋषि मोहित हो गया उनके मन में कावेरी से शादी करने का विचार आया ऋषि ने कावेरी से शादी की बात की लेकिन कावेरी शादी के लिए तयार नहीं हुई। लेकिन अगस्त्य ऋषि बार-बार शादी के लिए बात करता था इसलिए कावेरी शादी के लिए तैयार हो गई लेकिन कावेरी ने एक अट रखी और वह अट थी अगस्त्य ऋषि ने हमेशा मेरे साथ रहना चाहिए। यह अट अगस्त्य ऋषि ने मान्य किया और कावेरी से शादी किया।

कावेरी के वचन नुसार ऋषि कावेरी के पास रहते थे लेकिन उसे एक बार अपने शिष्य के तरफ जाना था और वहा पर रुखना था। ऋषि अपने शिष्य को मिलने गया और कुछ महीने नहीं आया। कावेरी उसकी बहुत राह देख रही थी। लेकिन ऋषि लौट के नहीं आया। कावेरी ने आत्महत्या करने का प्रयास किया और एक तालब में कूदि लेकिन कावेरी मरी नहीं कावेरी पृथ्वी के गर्भ से निकलकर ब्रम्हगिरी पर्वत पर गई और वहा से कावेरी नदी के रूप में बहने लगी।

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अगस्त्य ऋषि शिष्य के तरफ से लौट कर आए और  घर में कावेरी को बुलाया लेकिन कावेरी घर में नहीं थी ऋषि को बहुत दुःख हुआ उसे ढूढ़ते-ढूढते अगस्त्य ऋषि ब्रम्हगिरी पर्वत पर पहुंचे नदी के रूप में बहते कावेरी को ऋषि ने पहचान लिया और घर लौटने को कहाँ लेकिन कावेरी नहीं गई और ऋषि से कहने लगी मेरे शरीर का आधा भाग आपके आश्रम में रहेगा और आधा भाग से मै नदी के रूप में लोगो की सेवा करूंगी।  

पुराणों में लिखा है की कावेरी का जन्म संक्रांति के दिन हुआ है, इस कारण कावेरी के उद्गम स्थान पर संक्रांति के दिन श्रद्धालु आते है और दर्शन करते है। 

कावेरी को उपनदियाँ है और इस नदियों के कारण उसका प्रवाह बहुत ही बढ़ा होते जाता है। उद्गमस्थान से निकलने के बाद उसे कनका और गाजोटी उपनदियाँ  मिलती है यह नदिया कावेरी को जिस जगह पर मिलती है उस शहर का नाम ” भागमंडलम ” है यह शहर तीर्थ स्थल है। गंगा-यमुना के संगम का ठिकान प्रयाग जैसा पवित्र माना जाता है उसी तरह भागमण्डलम को भी बहुत ही पवित्र स्थल माना जाता है।

भागमंडलम से आगे कावेरी को हेमवती और लक्ष्मणतीर्थ दो उपनदिया मिलती है और उसका प्रवाह बहुत ही विशाल होता है। 

श्रीरंगम यह कावेरी के तट पर बसा तीर्थक्षेत्र है हर साल श्रद्धालु आते है और कावेरी में स्नान करके श्रीरंग के दर्शन लेते है। श्रीरंगपट्नम और कुंभकोणम तीर्थस्थल कावेरी के तट पर है और यहां की खास बात याने की अनेक जाती के पंक्षी  देखने को मिलते है। 

कावेरी नदी पर बारा डेम्प है हेमवती और लक्ष्मणतीर्थ उपनदियाँ जिस जगह पर कावेरी को मिलते है उस जगह पर पहिला डेम्प है। इस डेम्प के कारण आजूबाजू के खेतो में पानी की सुविधा हुई है और उस डेम्प के पानी से   बिजली तयार की जाती है। कन्नमबाडी डेम्प बहुत ही प्रसिद्ध है। 

कर्नाटक, तमिलनाडु, और आंध्रप्रदेश तीनों राज्यों को कावेरी सुजलामसुफलांम करते हुए बंगाल के खाड़ीमे समुन्दर को मिलती है उस समय उसका प्रवाह संथ, छोटासा होता है इसलिए कावेरी को ” बूढी कावेरी ” कहते है।

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