Mother Ganga river of India:माँ गंगा नदी की कहानी (ganges river festival)

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भारत के सभी नदियों से गंगा नदी का सर्वोच्च मान है। गंगा में स्नान करने से सभी पाप खंडन होते है, हर दिन गंगा में स्नान करने से जन्म-मृत्यु के याने मोक्ष की प्राप्ति होती है।

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माँ गंगा की रहस्यमय कहानी | The mysterious story of Mother Ganga of India

अश्वमेध यज्ञ:

प्राचीन काल में अपने भारत वर्ष में एक पराक्रमी सगर नाम का राजा था। राजा को लगता था की मै चक्रवर्ती सम्राट बनु ऐसा विचार सगर राजा के मन में आया। चक्रवर्ती सम्राट बनने के लिए सगर राजा ने अश्वमेध यज्ञ करने का निश्चय किया और घोडा छोड़ दिया। राजा का निश्चय देख के देवों का राजा इंद्र घबरा गया क्यों की उसे लगता था की अगर सगर राजा का अश्वमेध यज्ञ सफल हो गया तो स्वर्ग का राज्य भी छीन लेगा ऐसा डर इंद्र को लगता था। इंद्र ने डर के कारन अश्वमेध यज्ञ के लिए छोड़े हुए घोड़े को पकड़ा और कपिल ऋषि के आश्रम में बांध के रखा। Mother Ganga river of India

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गंगासागर मेला जहा लगता है, याने की गंगा नदी जिस जगह पर बंगाल के खाड़ी को मिलती है। उस जगह पर कपिल ऋषि का आश्रम था।

अश्वमेध यज्ञ का घोडा दिख नहीं रहा था इसलिए सगर राजा के साठ हजार पुत्र घोड़े को ढूढ़ने के लिए जंगल में गए ढूढते-ढूढते कपिल ऋषि के आश्रम में पहुंचे। आश्रम में घोडा बंधा हुआ था यह देखकर ऐसा लगा की ऋषि ने ही घोडा चुराया है इसलिय ऋषि को ही सगर राजा को पुत्र युद्ध के लिए फुकार रहे थे। ऋषि तपश्चर्या कर रहे थे सगर राजा के पुत्र के आवाज के कारन ऋषि की तपश्चर्या भंग हुई और क्रोध में आकर ऋषि ने उन साठ हजार पुत्रों को शाप दिया की ” भस्म हो जाओ ” और साठ हजार पुत्र भस्म हो गए। सगर राजा को पता चला तो वे बहुत दुःखी हुए। राजा सगर के पास उन्हें जिन्दा करने का कोई उपाय नहीं था। Mother Ganga river of India

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माँ गंगा धरती पर कैसे अवतरित हुई और सगर राजा के पुत्रों का उद्धार |  How the Ganga landed on the earth and the salvation of the sons of the Sagar king

राजा सगर के नातू अंशुमान को अपने पूर्वजों के मृत्यु का कारन पता चला और वे कपिल ऋषि के आश्रम में गए ,ऋषि को नमस्कार किये ऋषि को उनके नम्रतापूर्वक स्वभाव देखकर ऋषि बहुत ही खुश हुए।ऋषि ने घोड़े को उनके हवाले किया लेकिन अपने पूर्वजों को जिन्दा करना उनके बस की बात नहीं थी। ऋषि ने अंशुमान से कहा ” गंगा नदी का प्रवाह बहते-बहते इस आश्रम में जब-तक नहीं आएगा तब-तक आपके पूर्वजों का उद्धार नहीं होगा। Mother Ganga river of India

गंगा नदी उस समय ब्रम्हदेव के कमंडल में थी। गंगा नदी को धरती पर लाने के लिए अंशुमानने ब्रम्हदेव की तपश्चर्या कि लेकिन ब्रम्हदेव उसे प्रशन्न नहीं हुए। अंशुमान का लड़का दिलीप राजा इसने भी ब्रम्हदेव की तपश्चर्या की लेकिन उसे भी ब्रम्हदेव प्रसन्न नहीं हुए। दिलीप राजा का लड़का भगीरथ इसको सिद्धि प्राप्त थी उसने ब्रम्हदेव की बहुत ही कठोर तपश्चर्या करके ब्रम्हदेव को प्रसन्न किया और गंगा को धरती पर लाया इसलिए गंगा को ” भागीरथी ” कहते है। Mother Ganga river of India

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ब्रम्हदेव के कमंडल से निकला हुआ गंगा का प्रवाह एक साथ धरती पर गिरा रहता तो धरित का स्तर तोड़ के सीधा पाताल में गया रहता इसलिए भगवान शंकर ने कैलाश पर्वत पर खड़े रहके गंगा के प्रवाह को अपने जटा में बांध लिया।

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गंगा को धरती पर लाने के लिए राजा भगीरथ को पुनः भगवन शंकर के लिए तपश्चर्या करना पड़ा और भगवन शंकर प्रसन्न हुए और गंगा को अपने जटाओं से मुक्त किया। शंकर को गंगा बहुत ही प्यारी थी इसलिए गंगा को ” हरिप्रिया ” भी कहते है।

भगवन शंकर के जटाओं से गंगा का प्रवाह निकला रास्ते में जहु ऋषि तप कर रहे थे। गंगा के तेज प्रवाह से ऋषि का आश्रम बह गया। ऋषि बहुत ही क्रोधित हुए और क्रोध में गंगा के प्रवाह को पि लिया। राजा भगीरथ को पुनः जहु ऋषि को प्रसन्न करने के लिए तीसरी बार तप करना पड़ा और जहु ऋषि प्रसन्न हुए और गंगा को बहार निकाला इसलिए गंगा को ” जहुतनिया ” भी कहते है।

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भगीरथ के पीछे -पीछे गंगा आई और हजार किलोमीटर प्रवास करके गंगा आखिर में बंगाल के खाड़ी में समुंदर को मिलती है। रास्ते में कपिल ऋषि के आश्रम में जाकर भगीरथ के पूर्वजों का शापमुक्त करके उद्धार करती है।

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गंगा नदी की उत्पत्ति | Origin of river Ganges

गंगा नदी की मुख्य शाखा भागीरथी है जो कुमायूँ में हिमालय के पास गंगोत्री है और वहा पर गाय के मुँह जैसा गुफा है इस गुफा से गंगा की उत्पति हुई है। गंगोत्री यह ठिकान बरो मास बर्फ से ही ढका रहता है यहाँ आना बहुत ही कठिन है रास्ते पर बर्फ ही बर्फ रहता है पेड़,पौधे,पंछी कहि नजर नहीं आते लेकिन भक्तगण और  गिर्यारोहक पहुँच कर गंगा के उत्पति के स्थान का दर्शन करते रहते है।

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गौमुख से निकलनेवाली गंगा पर्वत शिखर को पार करते हुए बहुत ही तेज प्रवाह से आगे बढ़ते जाती है। उद्गम के पास गंगा का रूप छोटा है लेकिन उत्तरकाशी से देवप्रयाग आने के बाद गंगा का रूप बहुत ही बड़ा होता है। देवप्रयाग से ऋषिकेश और हरिद्वार को पहुँचती है। हरिद्वार के आगे में गंगा मैदानी प्रदेश से बहते रहती है।

गंगा नदी की उपनदियाँ है। अलकनंदा और मंदाकिनी यह दो नदियाँ हिमायल की नदियाँ है और गंगा नदी को देवप्रयाग में मिलती है। आगे चलके गंगा नदी बंगाल के खड़ी में समुंदर को मिलते तक यमुना, घागरा, गंडक, सोनकोशी, बहुत ही नदियाँ गंगा में सम्मिलित होती है। इस उपनदी में सबसे मुख्य और बढ़ी उपनदी यमुना है जो गंगा को प्रयाग में मिलती है।

हरिद्वार के मैदानी प्रदेश पार करते हुए 2500 किलोमीटर प्रवास करके गंगा बंगाल के खाड़ी में समुंदर को मिलती है। समुन्दर को मिलने के बाद पद्दमा, मेघना और हुगळी इस तीन नदी के शाखा में विस्तार होता है। पदमा पूरब से जाकर के ब्रम्हपुत्रा को मिलती है। मेघना समुन्दर को मिलती है और हुगळी नदी कलकक्ता के दिशा में जाती है। इन तीनों शाखा के क्षेत्र  को ” त्रिभुज क्षेत्र ” कहते है। यह बहुत ही उपजाऊ क्षेत्र है इस प्रदेश में बहुत जंगल है। जंगली जानवर रहते है ऐसा बंगाल का ” सुंदरबन ” भी त्रिभुज क्षेत्र में ही है।

गंगा नदी से पावन हुए क्षेत्र

धार्मिक रूप से गंगा को जितनी महत्वपूर्ण है उतनी ही देश के विकास के लिए भी महत्वपूर्ण है। गंगा से बहुत जगह पर नहर बनाकर खेती को पानी दिया जाता है। उत्तरप्रदेश का गंग नहर सबसे बड़ा है। इस नहर के शाखावों ने पश्चिम के क्षेत्र को सिंचाई का फायदा मिला है। उत्तर प्रदेश का पूरब का भाग, बिहार और पश्चिम बंगाल प्रदेश क्षेत्र के खेती को पानी दिया जाता है।

हरिद्वार से लेकर बंगाल के खाड़ी तक बहुत ही ब्रिज बाँधे हुए है। प्रयाग ब्रिज, फाफामऊ ब्रिज, शास्त्री ब्रिज, मिर्झापुर ब्रिज, काशी ब्रिज, इत्यादि ब्रिज बहुत ही फेमस है। हाल ही में पाटना के पास ” महात्मा गाँधी सेतु ” इस नाम का पाचकिलोमीटर दुरी का ब्रिज बँधा हुआ है। यह ब्रिज ” एशिया खंड ” का सबसे बढ़ा ब्रिज है।

पश्चिम बंगाल का परक्का धरण बहुत ही प्रसिद्ध है। उत्तर प्रदेश में टिहरी इस जगह पर बहुत बढ़ा ब्रिज है इस ब्रिज की उचाई 265 मीटर है और यह ब्रिज विश्व का सबसे ऊचा ब्रिज है ऐसा कहा जाता है।

हरिद्वार और प्रयाग यह प्रसिद्ध तीर्थक्षेत्र है।प्रयाग में गंगा, यमुना और सरस्वती इस नदियों का संगम होता है। जिस जगह पर तीनों नदियाँ का मिलाप होता है उस जगह को ” त्रिवेणी क्षेत्र  ” कहते है। बनारस &  वाराणसी प्राचीन काल से विद्या और संस्कृति के केंद्र है। पाटना यह सम्राट अशोक की राजधानी पहले पाटलिपुत्र के नाम से पहचानते थे। माँ गंगा हमारे लिए जीवनदायिनी है।

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