How did Dr.A.P.J.Abdul kalam become missile man?

How did Dr.A.P.J.Abdul kalam become missile man?:डॉ.ए.पि.जे अब्दुल कलाम कैसे बने मिसाईल मैन?, missile man apj abdul kalam essay in hindi. 

How did Dr.A.P.J.Abdul kalam become missile man?

डॉ.ए.पि.जे अब्दुल कलाम जी अमेरिका गए तभी उन्हें पता चला की रॉकेट बनाने की प्रणाली अपने भारत देश की है। अमेरिका रॉकेट बनती है लेकिन रॉकेट बनाने की टेक्निक भारत की और से पता चली है इस बात का पता चलने से अब्दुल कलाम को टीपुसुल्तान के ज़माने के शास्त्रज्ञ के प्रति गर्व महसूस करने लगे। How did Dr.A.P.J.Abdul kalam become missile

अमेरिका का दौरा करने के बाद कुछ ना कुछ शिकणे को मिलता है, अब्दुल कलाम को भी शिकणे को मिला।अमेरिका के लोगों पर बैंजामिन  फ्रैंकलिन के विचार का प्रभाव पड़ा है, उनके विचार ऐसे है की , उन चीजों का अनुभव करे, जो दर्दनाक है,उनका सामना करे,उनके बारे में सोचे,शोध करे,समस्या का हल होने तक प्रतीक्षा न करें। यह विचार अमेरिका के लोंगो में है। टीपुसुल्तान के हार के बाद  भारत में रॉकेट बनाना बंद हुवा,लेकिन स्वतंत्रता मिलने के बाद रॉकेट बनाने की तयारिया सुरु हुई और अब्दुल कलाम जी को अमेरिका के ” नासा ” में प्रशिक्षण के लिए भेजा गया। प्रशिक्षण पूरा करके भारत आए। How did Dr.A.P.J.Abdul kalam become missile

डॉ.विक्रम साराभाई ने थुंबा खेड़े गांव में विज्ञान-तंत्रज्ञान और अवकाश अनुसंधान केंद्र में डॉ अब्दुल कलाम को बुलाया। नासा में बनाया गया यान जिसका नाम है,’ नायक अपाचे ‘ यह अवकाश यान भारत का पहिला अवकाश यान है, और इसका काम करने के लिए अब्दुल कलाम जी जुट गए। How did Dr.A.P.J.Abdul kalam become missile

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यह काम थुंबा में चालू था। इस यान का काम पूरा होते ही यान को उड्डान की जगह पर ले जाया गया। उड़ान का समय छे 6 बजे का था।

इस तरह से भारत के पहले अंतराल यान जिसका नाम है  ” नायक अपाचे ” 21 नोहंबर 1963 को आकाश में छोड़ दिया गया। इस प्रकल्प में अब्दुल कलाम के साथ डी.ईश्वर दास और अरवमुंडन यह साथ में काम कर रहे थे।

इस सफल उड़ान के बाद डॉ.विक्रम साराभाई ने खोजकर्ताओं की बैठक बुलाई। भारत के ”अवकाश संशोधन और क्षेपणास्त्र विकास ” कार्यक्रम की दिशा निश्चित की। डॉ.विक्रम साराभाई ने खोजकर्ताओं की ” स्पार्क प्लग ” बनाए।

”अवकाश संशोधन और क्षेपणास्त्र विकास कार्यक्रम” में निचे दिए गए प्रकल्प का समावेश किया गया था।

1 ) सैनिक विमान उड़ान पद्धत

2 ) थुंबा का विषुववृत्तीय रॉकेट प्रक्षेपण केंद्र

3 ) सॅटेलाईट लॉन्च व्हेईकल ( एल. एल. व्ही )

4 ) भारत का अवकाश कार्यक्रम याने रोहिणी साउंडिंग रॉकेट ( आर एस आर )

इन चार प्रकल्प को चालू करने के लिए अमेरिका , रशिया और फ़्रांस इस देश की मदद लेना था।

” थुंबा इक्किटोरियल रॉकेट लॉन्चिग स्टेशन ” (टलर्स) ,” फिजिकल रिसर्च लोबोरटरी” और स्पेस सायंस अण्ड रिसर्च सेंटर ” इ. संस्था स्थापन किए।

रॉकेट के तीन प्रकार | Three types of rockets

1) साउंडिंग रॉकेट

यह रॉकेट पृथ्वी के पास के वातावरण की खोज करता है। पृथ्वी के पास से दो सौ (200) मैल वातावरण से पृथ्वी के लास्ट के थर तक के घटक का अभ्यास इस रॉकेट से किया जाता है। यह रॉकेट अपने साथ उपकरण लेके जा सकते है। लेकिन इस उपकरण को गति देके पृथ्वी के आसपास घूमने की क्षमता नहीं रहती है।

2) लॉन्चिंग रॉकेट्स  सॅटेलाईट लॉन्च व्हेइकल (एस एल व्ही)

इस रॉकेट के माध्यम से कृत्रिम उपग्रह किंवा कोई चीज अंतराल कक्ष में छोड़ी जा सकती है।स्पीड को लिमिट में रख के घूमते हुए भी रख सकते है। रॉकेट प्रक्षेपण वाहक के कुछ टप्पे रहते है। लास्ट के टप्पे में जाने के बाद अंतराल में लेके जाने के लिए वाहक उस चीज को गति देता है। वैसे ही पृथ्वी से रॉकेट का नियंत्रण कर सकते है।

3) क्षेपणास्त्र / मिसाईल

यह रॉकेट का ही प्रकार है,लेकिन रॉकेट के आगे का टप्पा है। यह रॉकेट बहुत तेजी से जाता है। पृथ्वी से जानकारी भेजना, अपना लक्ष्य भेदने की क्षमता इस रॉकेट में है। पृथ्वी से इसका नियंत्रण कर सकते है।

रॉकेट निर्मिति में अपने भारत देश के प्रथम पंतप्रधान पंडित जवाहरलाल नेहरू और डॉ.विक्रम साराभाई इनका योगदान है।

डॉ.विक्रम साराभाई ने आगे की जबाबदारी डॉ.अब्दुल कलाम को दी है।

इस तीनों रॉकेट का उपयोग हवामान खता, लष्कर और संशोधन के लिए किया जाता है। देश परदेश के तंत्रज्ञ और संशोधन के माध्यम से डॉ.विक्रम साराभाई इनके मार्गदर्शन में डॉ.अब्दुल कलाम जी ने रॉकेट तंत्रज्ञान शिकणे को बहुत मेहनत की  है।

रॉकेट के निर्मित के साथ साथ हवामान मोजमाप करने के तंत्र  को चेक करना , पेलोड्स (उपकरण ) एकसाथ रखने को ”नोजकोण” यह संकु के आकर का उपकरण अतिउष्ण,इ. काम की जबाबदारी अब्दुल कलाम को दी गई थी।

बलशाली कपडा तयार करने के तंत्र का उद्घाटन फरवरी 1969 को पंतप्रधान श्रीमती इंदिरा गाँधी के शुभ हस्ते थुंबा में किया गया।

डॉ.अब्दुल कलाम के रॉकेट निर्मिति के काम पर डॉ विक्रम साराभाई हमेशा खुश रहते थे।

रोहिणी – 75 यह रॉकेट 20 नोहंबर 1967 को अंतराल में छोड़ा गया।

डॉ.अब्दुल कलाम को डॉ.विक्रम साराभाई ने 1968 में दिल्ली में मिलने के लिए बुलाया।

इस तरह से डॉ.विक्रम साराभाई और डॉ.अब्दुल कलाम इन दोने गुरु और शिष्य के जोड़ी की चर्चा भारत देश में होने लगी।

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