guru dakshina eklavya: गुरुदक्षिणा एकलव्य ( parampara)

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आधुनिक युग में हम स्कुल, कॉलेज, युनिव्हर्सिटी में पढ़ते है।लेकिन प्राचीन काल में जब शिक्षा के ऐसे मंदिर नहीं थे तब बच्चे मठ या आश्रम में जाकर पढ़ते थे। या फिर राजपुत्र अपने महल में ही पढ़ते थे। शिक्षा पूरी होने पर गुरु अपने शिष्य से गुरुदक्षिणा माँगते थे फिर गुरु जो भी दक्षिणा माँगे उसे देना ही पढ़ता था।

guru dakshina eklavya: गुरुदक्षिणा एकलव्य ( parampara)

कहानी 1 dakshnina 

प्राचीन काल की बात है एक आश्रम में शिष्यों की पढ़ाई पूरी होने पर गुरुने शिष्यों से दक्षिणा में क्या माँगा जाय ऐसा सोचने पर उन्हें कुछ सुझा उन्होंने सभी सत्रों को बुलाकर कहा की मेरे लिए पानी लेकर आओ सभी बच्चो ने आश्रम में लाई हुई नई घागर उठाये और नदी पर गए सभी ने घागर पानि मे डुबाए और पानी भर के निकले आधे रास्ते में देखे तो घागर खाली हुई।

क्यों की घागर को छोटे-छोटे छिद्र थे सभी शिष्य गीले होकर आश्रम पहुंचे किन्तु एक शिष्य ने युक्ति चलाई अपना शर्ट निकला उसे अच्छे से धोकर उसे पानी में डुबोकर अपने हाथों में उसे आश्रम लाया और गुरूजी से कहा -” गुरूजी, यह लीजिये पानी ” ऐसा कह के गुरूजी के चरणों पर पानी डाल दिया गुरूजी को उस बच्चे का बढ़ा अभिमान हुवा सभी शिष्यों को गुरूजी ने कहा की मेरी शिक्षा पूरी होने पर मैंने आपसे गुरुदक्षिणा माँगी थी पर आप सभी में से सिर्फ एक ने ही मेरी शिक्षा अर्जित की और अपने जीवन में उतारी और सिर्फ एक ही शिष्य ने मुझे आज गुरुदक्षिणा दी मेरे परीक्षा में आप सभी नापास हुए मात्र एक ही शिष्य पास हुआ।

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हमारे गुरु हम सभी छात्रों को एक जैसाही पढ़ाते है फर्क इतना होता है की हम उसे कितना अर्जित करते है

कहानी 2 dakshnina 

प्राचीन काल में आश्रम की शिक्षा पूरी होने पर गुरुजी ने सभी छात्रों की परीक्षा लेना चाहा देखता हु कौन कितने पानि मे है, गुरूजी ने शिष्यों को तांबे का लोटा दिया और सभी को कहा ” इसे साफ कर के इस में मेरे लिए पानी लाना है, सभी शिष्य नदी पर गए सभी ने लोटे को बाहर से बहुत चमकाया और पानी भर के आश्रम लौटे

किन्तु एक बच्चा बहुत देर तक आश्रम नहीं लौटा उसने लोटे को अंदर बहार से पूरी तरह से साफ किया और उसमे पानी भर कर आश्रम पहुंचा देर से आश्रम पहुंचने से गुरूजी उसे डाँटेंगे इसलिए सभी शिष्य उसे हॅसने लगे गुरूजी ने लेट आनेवाले छात्र से इसका कारण पूछा तो शिष्य ने जवाब दिया, गुरूजी लोटा अंदर से बहुत मलिन था उसे साफ करने में समय लगा गुरूजी शिष्य का जवाब सुनते ही खुश हुए और बोले मैंने दी हुई शिक्षा सिर्फ इसी एक शिष्य ने आत्मसात की।

साफ करने में भी समय लगता है किन्तु लोग सिर्फ बाहरी सुंदरता पर ही ध्यान देते है और मन को मलिन रखते है अगर आपको सुन्दर बनना ही है तो पहले अपने मन का मैल साफ कीजिए तभी आपकी सुंदरता समाज में चमक उठेगी।

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मन की मलीनता से अच्छाई ढक जाती है और मन की सुंदरता से बाहरी कुरूपता भी सुंदर और सुशिल दिखाई देती है।

आज की दुनियाँ के बच्चे ” गुरुदक्षिणा ” का मतलब ही नहीं समझते आज ”गुरु” को ही ”गुरु” इस पवित्र शब्द का अर्थ नहीं समझता शासन इतना पैसा शिक्षा पर खर्च कर रहा है पर फिर भी शिक्षा के द्वार पर गंदगी और मलिनता ही दिखाई देती है। उसमे कमी होने से घट ही हो रही है ” गुरु ” आज दक्षिणा में रिश्वत ले रहे है और ऐसे रिश्वत लेनेवाले गुरु में पवित्र गुरु भी बदनाम होकर शिक्षा का मंदिर भी अपवित्र होते जा रहा है।

गुरुदक्षिणा में क्या दे गुरु को

गुरुदक्षिणा में गुरु को लाल पेन देना चाहिए क्यों की उसी लाल पेन की आधार पर हमारे सच्चे गुरु हमारी गलतिया बताकर उनमे सुधार करने का मार्ग बताते है और हम उन गलतियों को समज कर आगे बढ़ते है।

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