महात्मा ज्योतिबा फुले जी का जीवन चरित्र | Life Character Of Mahatama Jyotiba Phule ji

Mahatma Jotiba Fule ji ka jivancharitra

 

महात्मा जोतिबा फुले इनका जन्म 11 अप्रैल 1827 में पुणे में हुवा है। उनके माताजी का नाम – चिमनाबाई गोविंदराव फुले है। उनके पिताजी का नाम गोविंदराव फुले है।जोतिबा(उम्र 13 साल ) का विवाह सावित्रीबाई( उम्र 9 साल ) से  इ.सा 1840 में हुआ है।जोतिबा 9 साल के थे तभी उनके माताजी का निधन हो गया। उनकी देखभाल उनका पालनपोषण सगुणताई ने किया।जोतिबा के पिताजी की फूलो की बाग और दुकान था। 1841 को जोतिबा 14 साल की उम्र में स्कॉटिश मिशन के स्कुल जाने लगे। धीरे-धीरे वे पुणे के बुधवारबाडे में सरकारी स्कुल में जाने लगे स्कुल में जार्ज वाशिंग्टन,  छत्रपति शिवाजी महाराज और अन्य बुक पढ़ने लगे । जार्ज वाशिंग्टन यह गरीब किसान का लड़का था। उनके पिताजी जंगल से लकड़ी काट के बेचने का काम करते थे। जार्ज सेना में भर्ती हुआ उन्हों ने ब्रिटिश सरकार के खिलाप क्रांति की। अमेरिका को मुक्त किया और स्वतंत्र अमेरिका का पहिला राष्ट्राध्यक्ष बना।जार्ज वाशिंग्टन और शिवजी महाराज के लेख पढ़के जोतिबा बहुत ही  प्रभावित हुए।

 

जोतिबाजी ने  थॉमस पेन की ” राईट्स ऑफ़ मेन ” बुक पढ़ी। थॉमस जब छोटा था तभी उसको बहुत ही दुःख सहना पड़ा।थॉमस ने ब्रिटेन को छोड़ दिया और अमेरिका चला गया। थॉमस के कॉमनसेन्स, पब्लिक गुड़, दी राईट ऑफ़ मेन, इस बुक को पढ़के उन्हें एक प्रेरणा मिली की हम अपने देश को ब्रिटिश सरकार से मुक्त करवा सकते है। जोतिबा और उनके मित्रों ने लहुजी बुवा के पास व्यायाम, कुश्ती, दांडपट्टा, बन्दुक चलाना इत्यादि का प्रशिक्षण पूरा किया। आगे चल के जोतिबा को लहुजी बुवा और रनोबा जी का साथ मिला।

महाराष्ट्र में ब्रिटिशों के खिलाप विद्रोह किया। उमाजी नाईक ( 1826 ) कोड्यांची, राघोजी भांगे, बापू भांगे, रामचंद्र गोरे इन्होंने ब्रिटिश सरकार के खिलाप वद्रोह किया और उन्हें फाशी की सजा हुई। यह सारि बाते पता रहते हुए भी जोतिबा के मन में एक ही बात दौड़ती थी की हम ब्रिटिश सरकार के खिलाप विद्रोह करना चाहिए। जोतिबा ने ब्रिटिश के दो सोल्जर की गन्ने से बहुत पिटाई भी की थी। यही उनका पहिला विद्रोह था।

उस समय में केशवपन, सथी जाने की परम्परा थी। गोवंडे, वाडवेकर इन के घर में उनके सिस्टर, भाभी  विधवा हुए थे। उनका जबरदस्ती में केशवपन किया गया था। वाडवेकर की सिस्टर प्रेग्नेंस थी उने आत्महत्या करनी पड़ी। गोवंडे के विधवा भाभी को उसके पति के चिता पे जला दिया था। विद्वाओं की यातना जोतिबा ने अपने आँखों से देखे उनका ससराल और मायके में पापी, चण्डाल समज के उनके साथ छल करते थे।

वस्ताद लहुजीबुवा :

जोतिबा और सावित्रीबाई के समाज जागृति में लहूजि बुवा का बहुत ही अच्छा समर्थन था। शिवाजी महराज ने उन्हें ”राऊत ” यह पदवी दी थी। लहुजी के पिताजी राघोजी बहुत बड़े योद्धा थे। उनके पिताजी को पेशवाई में उन्हें नरव्याघ्र कहा जाता था। पेशवे के लास्ट के लढाई में सेनापति बाबू गोखले के सैन्य को काट दिया गया था। इस लढाई में राघोजी का खून हुवा।

पुरंदर किला के पास ”पेठ” नाम का एक छोटा सा गांव है वहापर नोहंबर 1800 में लहुजी का जन्म हुवा था। राघोजी के माध्यम से लहुजी को तलवार चलाना, घोड़ो पर बैठना , बन्दुक चलाना, गनिमी काव्य, दांडपट्टा चलाना, पर्वतरोहण इत्यादि सैनिकी शिक्षा लहुजी ने आत्मसात की थी। अपनी खुली आँखों से लहुजी ने अपने पिताजी का खून होते हुए भी देखा उस समय उनकी उम्र करीबन 17,18 साल की थी।  पेशवे की राजशाही 1818 में खत्म हो गई। लहुजी बुवा का निधन पुणे के संगम पुल के पास 17 फरवरी 1885 को उम्र के 85 साल में हुआ है ।

 

 केशवपन, सती प्रथा की जानकारी :

नारी को पति के मृत्यु के बाद सथी जाने की परम्परा थी या केशवपण करके हिन जैसा जीना पढ़ता था। सती गए नारी को पतिव्रता कहा जाता था। 27 सप्टेंबर 1823 को राधाबाई सती जाने के लिए गई लेकिन आधेमेसे चिता से कूद के निचे उतरी लेकिन उसे बास से चिता पर ही ढकेल के रखे और अपने प्राण देने पढ़े।

औरंगाबाद जिल्हे में 23 जुलाई 1882 को देशपांडे नाम के व्यक्ति का मृत्यु हो गया। उसकी पत्नी सती जाने को जिद करने लगी। उसने सती नहीं जाना चाहिए इसलिय उसके रिलेटिव समशानघाट में गए लेकि उसके पहले ओ चिता पर चढ़ गई उसको आग के चटके लगे और वे घर चली गई। देशपांडे इसम का प्रेत एक दिन तक वही पड़ा रहा और ब्रिटिश के सहायता से उसको जलाना पड़ा। 1829 को ब्रिटिश सरकार ने कायदा पास किया था। उस कायदे के कारण उस नारी को जलाया नहीं गया।

1815 से 1824 तक सती गई नारी की संख्या छे हजार ( 6000 ) है यह अकड़ा उत्तर भारत का है।

ईश्वरचंद्र विद्यासागर :

नाम : ईश्वरचंद्र बन्दोपाध्याय

जन्म तिथि: 26 सितंबर 1820

जन्म स्थान : मेदिनीपुर (पश्चिम बंगाल)

पिताजी का नाम : ठाकुरदास बन्दोपाध्यान

माताजी का नाम : भगवती देवी

 

ईश्वरचंद्र विद्यासागर स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी थे। उन्होने विधवा विवाह के लिए कानून पास करने के लिए संघर्ष किए। वे गरीब परिवार से तालुख रखते थे। प्रायमरी की शिक्षा गांव के स्कुल से पूरी की और आगे की पढ़ाई के लिए कोलकत्ता चले गए। सन 1839 में एलएलबी की पढ़ाई पूरी की उसके बाद 1841 में फोर्ट विलयम कॉलेज में पढ़ना सुरु किया। संस्कृत कॉलेज में सचिव पद पर नियुक्त हुए। क्षिक्षा पद्धति में बदलाव होने के लिए प्रशासन को निवेदन किया और कॉलेज में तान-तनाव निर्माण हुवा।  उन्हें कॉलेज छोड़ना पड़ा। सन 1949 में फिर से कॉलेज में प्रोपेसर के पद पर नियुक्त हुए उसके बाद प्रधानाचार्य बने और सभी जाती के बच्चों के लिए शिक्षा के द्वार खुले किए।

मेट्रोपोलिटन कॉलेज की स्थापना किए। इस कॉलेज का खर्चा खुद वहन करते थे। बहुपत्नी, बालविवाह और विधवा विवाह के लिए आवाज उठाए और सन 1856 में विधवा पुनर्विवाह का कानून पास किए। उन्हें विद्यासागर की उपाधि से सन्मानित किया गया था।  इसीलिए उन्हें ईश्वरचंद्र विद्यासागर के नाम से जानते है. ज्योतिबा फुले, लोकहितवादी, विष्णुशास्त्री, कुलकर्णी, पांडुरंग करमरकर आदि ने इस कार्य को आगे बढ़ाया।

विधवा विवाह की जानकारी :

लोकहितवादी और जोतिबा ने सती प्रथा के विरुद्ध काहुर उठाया था। विधवा विवाह का पुरस्कार किया। 8 मार्च 1860 को जोतिबाने शेणवी जात के सारस्वत विधवा का विवाह शेणवी विदुर से कर के दिया। यह पहिला विधवा विवाह था। दूसरा विधवा विवाह रघुनाथ जनार्दन और नर्मदाबाई इनका 1864 में लगवा के दिए। विष्णुशास्त्री पंडित ने विधवा के पुनर्विवाह के लिए प्रसार प्रचार किया। ” इंदुप्रकाश ” नाम का साप्ताहिक निकाला। 28 जनवरी 1856 को ” पुनर्विवाहोत्तेजक मंडल ” की संस्था निकाले और बहुत पुनर्विवाह करवा के दिए। विष्णुशास्त्री पंडित जोतिबा के मित्र थे। न्यामृति रानडे, लोकहितवादी देशमुख यह विधवा विवाह के हित में लेख और भाषण करते थे। रानडे 1873 में विधुर होने के बाद 32 साल की उम्र में 11 साल की बालिका से विवाह किया। विष्णुशास्त्री पंडित यह कर्ते सुधारक थे उनकी पत्नी मरने के बाद उन्होंने विधवा के सात विवाह किया। सदाशिवराव कुलकर्णी इन्हों ने अपना प्रथम विवाह एक विधवा के साथ किया। सदाशिवराव उनकी कन्या ताराबाई उनको विधवा की कन्या कहकर उनका तिरष्कार किया गया। अमरावती के मोड़क ने ताराबाई से विवाह किया। नागपुर, अमरावती,विभागात में ताराबाई मोड़क सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में उनकी पहचान थी। 1980 के आसपास उनका निधन हुवा। वे जोतिबा और सावित्रीबाई का प्रचार करते थे। पंडित,कुलकर्णी पांडुरंग करमरकर उन्हों ने भी विधवा से विवाह किया। विष्णुशास्त्री पंडित यह 1852 में स्थापन किए गए शिक्षण संस्था के विद्यार्थी थे। उसके बाद वे सदस्य बने उन्हें ” महाराष्ट्र के ईस्वरचंद विद्यासागर ” कहा जाता है।

 

ज्योतिबा का खून करने का प्रयास :

ज्योतबा फुले जी के छोटे-मोठे सत्कार हुवा करते थे। उस समय उनके अंगरक्षक लहुजी, राणोजी के अखाड़े के आदमी रहते थे। उनका स्वागत करते समय हार में साप और बिंछू रखते थे।

एक दिन की बात है एक रात दो लोग उनके घर में उनका खून करने के लिए गए ज्योतिबा सो रहे थे। उनका आने का आवाज ज्योतिबा को आया और ज्योतिबा नीद से जाग गए और उनको पकड़ लिए उनके मुँह पर से बुरखा हटाया ।  लेकिन उनके पहचान के लोग निकले। धोंडिबा नामदेव कुंभार और रामोशी रोड़े यह उनके रात के स्कुल में पड़ते थे। ज्योतिबा के दुशमन ने उनका खून करने के लिए 100/- रु देकर के भेजे ऐसा वे बताने लगे । सावित्रीबाई और ज्योतिबाने उनको बोला की अगर हमारा खून कर के आप जैसे गरीबों का फायदा होता होगा तो हमे मार डालो। हम गरीबो के लिए मेहनत करते है और आप हमे मारना चाहते हो तुम्हे क्या मिलेगा। ऐसा कहने पर जोतिबा को शरण आए। आगे दोनों उनके साथ रात के स्कुल में पढ़ने लगे । रामोशी रोड़े उनका अंगरक्षक बना। धोंडिबा कुंभार आगे संस्कृत पढ़ा और कुछ ग्रंथ लिखे। ”वेदाचार ” नाम की बुक प्रकाशित हुई। 1873 में स्थापन किए गए सत्यशोधक समाज का धोंडिबा आधारस्तंभ हुवा। नोहंबर 1896 में जेष्ठ श्रृंगेरी कुडलकी के स्वामी जगद्गुरु उन्होंने धोंडिबा को ”पंडितराव ” धोंडीराम नामदेव ऐसा किताब दिया। दोनों जोतिबा के आखिर तक अच्छे कार्यकर्ते रहे।

जोतिबा के प्रेरणा स्थान छत्रपति शिवराय :

 

छत्रपति शिवाजी महाराज के बल पर पेशव्य ने राज्य किए। छत्रपति शिवाजी के हिंदवी स्वराज्य को दबा के ब्राम्हणी राज्य स्थापन किए।छत्रपति शिवराय के समाधी की देखभाल नहीं किए जोतिबाने पुराने कागजात खोज के छत्रपति शिवाजी महाराज भोसले पर 1866 में पोवाड़ा लिखा। ब्रिटिश सरकार के कारकीर्द में पोवाड़ा लिखने वाले प्रथम जोतीराव थे। पोवाडेकार करके अपना नाम ” कुढ़वाडी भूषण” लिखा है। लेकिन यह नाम उन्होंने शिवाजी महाराज के लिए लिखा होगा ऐसा माना जाता है। यह पोवाड़ा 1869 में प्रकाशित हुवा। म.मो कुंटे उन्होंने 1869 में ” राजा शिवाजी ” इस काव्य को पुरस्कार मिला।

छत्रपति शिवाजी महाराज के समाधी का जीर्णोद्धार :

छत्रपति शिवाजी राजे जोतिबा के आराध्य दैवत थे , प्रेरणा स्थान थे। उन्होंने शिवाजी राजे के समाधी का पता लगाया। जोतिबा, सदाशिव गोवंडे, डॉ विश्राम घोले उन्होंने रायगढ़ पर लगातार तीन दिन में समाधी को खोज के निकाले (1880 ) समाधी के ऊपर घास और पेड़ों के पत्तों से समाधी ढक गई थी। समाधी को पानी से धोकर फूलों की माला अर्पण किए। ब्रिटिश कमिश्नर को अर्ज करके समाधी सुधारे और उसकी देखरेख करने के लिए समिति की स्थापना की जोतिबा के दोस्त नारायणराव लोखंडे उन्हों ने पुणे और मुंबई में सभा लेकर के समाधी को सुधारने के लिए चंदा जमा किए। ठाणे के जिल्हाधिकारी सिंक्लेयर उन्होंने स्वखर्च से समाधी को सुधारे सरकार की तरफ से 25 रु.चन्दा मिला और 4 रु साल के मिलते थे।

सत्यशोधक समाज की स्थापना :

सत्य सर्वांचे आदि घर। सर्व धर्माचे माहेर।

24 सप्टेंबर 1873 को महात्मा ज्योतिराव फुले ने सत्यशोधक समाज की स्थापना की है। सत्यशोधक समाज के प्रथम अध्यक्ष और कोषाध्यक्ष जोतीराव फुले को रखा गया। नारायण गोविंदराव कडलक कार्यवहक थे। सावित्रीबाई, सदाशिव गोवंडे, मोरबा वाडवेकर, रामसेट उरवने, डॉ विश्राम रामजी घोले, वकील पोलसानी राजन्ना लिंगु, कृष्णराव भालेकर, ज्ञानगिरिबुवा, विनायक बापूजी भंडारकर, विनायक बापूजी डेंगले, सीताराम सखाराम दातार इ.मित्र सदस्य थे। बरगणी 200 रु जमा हुई थी।

सत्यशोधक समाज के तीन तत्व है:- 1) सभी मानव एक ही भगवान के बच्चे है और उनका भगवान मातापिता है। 2) मातापिता (भगवान ) को मिलने के लिए किसी मध्यस्थ पुरोहित गुरु की आवश्यकता नहीं। 3)यह सभी तत्व कबूल करनेवाले को सभासद बनाया जाता था। जोतीराव ने 1853 को ” तृतीय रत्न ” नाटक लिखा। यह हिंदुस्तान में प्रथम समाजप्रबोधन नाटक था।

पुणे नगरपालिका :

1850 के नगरपालिका एक्ट के नुसार 1 जून 1857 को पुणे की नगरपालिका की स्थापन हुई।  प्रत्यक्ष कार्य 20 में 1858 को चालू हुवा।

हंटर कमीशन की स्थापना :

ब्रिटिश सरकार ने 1882 में भारतीय शिक्षण प्रणालिका अभ्यास करने के लिए सर विलयम हंटर इनके अध्यक्षता के निचे एक समिति का चयन किया गया उसे ही ” हंटर कमीशन” कहा जाता है।

जोतिबा के वाङ्ग्मय की जानकारी :

1) नाटक : तृतीय रत्न ( 1855 )

 

2 ) पवाडा : छत्रपति शिवाजी राजे भोसले :(जून 1869 ) छत्रपति शिवाजी महाराज जोतिबा के प्रेरणास्थान थे।

3 ) ब्राम्हणाचे  कसब 🙁 1869 )

 

4 )गुलामगिरी: (1873 )

 

5 ) शेतकऱ्यांचा आसुड : (अप्रैल -जुलाई 1883 )

 

6 ) सत्सार अंक 1 (13 जून 1885 ) अंक 2 ( अक्टुंबर 1885 )

 

7 ) इशारा : (15 जून ते 1 अक्टुंबर 1885 )

 

8 ) सत्यशोधक समाजोक्त मंगलाष्टक के सभी पूजाविधि आरंभ :

 

9 ) सार्वजनिक सत्यधर्म पुस्तक ( लेखन 1 अप्रैल 1889,प्रकाशक 1891 )

 

10) अखंडादी काव्यरचना :

 

 

महात्मा जोतिबाजी का निधन :

जोतिबाजी ने सावित्रीबाई के साथ 50 साल संसार किया। शाम में जोतिब जी  को अच्छा नहीं लग रहा था सावित्रीबाई ने शाम में डॉ घोले को बुलाया था उसके बाद रात के 2 बजे उनकी तबियत ख़राब हुई और दि 29 नोहंबर 1890 को ”क्रांतिसूर्य जोतिबा जी का निधन हुवा।

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